New Poem कहाँ सुकून ढूंढ़ता फिरूं अब ग़ैरों के मोहल्लों में
इल्म नहीं मुझे कि कितनी वफ़ा तिरे ख़ून में है
क्या तिरा मंसूबा, आख़िर क्यूं इतने जुनून में है
ख़ूब शौक़ से गुमराह कर रहे लोग मुसाफ़िरों को
गलत रस्ता बताना, न जाने किस क़ानून में है
पूरा ज़माना परेशां हैं अपनी ज़िन्दगी की राहों में
क्या फ़र्क़ पड़ता है, तू दिल्ली में है या रंगून में है
कहाँ सुकून ढूंढ़ता फिरूं अब ग़ैरों के मोहल्लों में
हमारे मोहल्ले में दोस्त आयें, तो हम सुकून में हैं
शाम-ए-ग़म क्या आई, वो हर रंग भूल गयें ‘अम्बर’
अब तो छूटने लगा वो भी जो उनके नाख़ून में है
Ilm nahin mujhe ki kitanee vafa tire khoon mein hai kya tira mansooba,
aakhir kyoon itane junoon mein hai khoob shauq se gumaraah kar rahe log musaafiron ko galat rasta bataana,
na jaane kis qaanoon mein hai poora zamaana pareshaan hain apanee zindagee kee raahon mein kya farq padata hai,
too dillee mein hai ya rangoon mein hai kahaan sukoon dhoondhata phiroon ab gairon ke mohallon mein hamaare mohalle mein dost aayen,
to ham sukoon mein hain shaam-e-gam kya aaee,
vo har rang bhool gayen ‘ambar’ ab to chhootane laga vo bhee jo unake naakhoon mein hai
HEART TOUCHING POETRY
बात बात प भले, रूस खिसिया जालन
बाबूजी
बाकी दुख मे जब रहिले त,याद आ जालन
बाबूजी
केहु देहाती केहु कहे ,पढ़े मे जीरो हवन
बाबूजी
जे भी बारन हमरा खाती, एगो हीरो हवन
बाबूजी
दुख मे घबरा जालन , अकुता जालन
बाबूजी
जे लाइन कटे त बेना हाकके,सुता जालन
बाबूजी
दुनिया के सबसे भारी,एगो काम कइलन
बाबूजी
हमनी के सेयान करे मे,अपने बूढ़ा गइलन
बाबूजी
हर लइका के जस हमरो,स्वाभिमान रहेला
बाबूजी
हम जहाँ भी रहिले ,संघे ताहर नाम रहेला
बाबूजी
हमनी खाती , तहरा केतना रहेला होश
बाबूजी
हम ओतना ना कर पाई,ई रहेला अफसोस
बाबूजी
हम केतना खुश बानी,करी का बखान
बाबूजी
जीयते सभकुछ क देल,तु त हव भगवान
बाबूजी

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